प्यार था या कोई सपना..🤔
मगर जो भी हो अच्छा लगता था.🙂
उनसे मिलकर खुद को जाना..
खुद से ज्यादा उसे चाहना..
जो भी हो मगर अच्छा लगता था.🙂
याद है मुझको वो पहली बार का मिलना..
मुस्कुरा कर पलके झुका कर उसका शर्माना.🙈
जो भी हो मगर अच्छा लगता था.🙂
दूर होकर कर भी..
हर पल उसको अपने पास महसूस करना चाहना.
जो भी हो मगर अच्छा लगता था..🙂
बात- बात पर एक दूसरे का मजाक बनना.😋
मुसीबत में साये के तरह साथ खड़ा रहना..🤝
जो भी हो मगर अच्छा लगता था.🙂
छोटी-छोटी बातो पर उसका गुस्सा करना.😞
बड़ी बडी आंखें दिखाना चेहरे का लाल हो जाना. 😡
वो रूठना मनाना मुंह बनना..😏
जो भी हो मगर अच्छा लगता था.🙂
मेरे नाराज़ या गुस्सा होने पर..
नादानी करना हंसाने की कोशिश करना.🙂
बडा सुकुन देता था..😊
जो भी हो मगर अच्छा लगता था..🙂
उनसे ही दिन की शुरुआत और रात अंत होता था..
उसका इंतेज़ार तो पलके भी किया करती थी..
जबतक आवाज ना सुन ले नींद कहां आती थी.😴
जो भी हो मगल अच्छा लगता था..🙂
हर बात का हिसाब लेना..
कहां थे क्या कर रहे थे फोन क्यों रिसिवर नहीं किये.
खाने खाये की नही खाये उफ़..🤦
कभी कभी बहुत चिढ़ भी जाते थे..
मगर जो भी हो अच्छा लगता था.☺️
दुनिया की हकीकत और..
धर्म की दीवार खड़ी थी.😔
पता था एक दिन जुदा होना है.😟
मगर जो भी हो अच्छा लगता था उसे चाहना.
भले उसे पा ना सकेंगे हम जानते थे.😢
फिर भी अंधों की तरह उससे प्यार करना.🥰
उसमें खो जाना..
जो भी हो मगर अच्छा लगता था.☺️
यह मेरी पहली रचना है।🙏
❤️ अंकित मेहता